मुंबई के शाश्वत और संतुलित विकास के लिए भूजल के प्रभावी प्रबंधन और नियोजन की आवश्यकता पर आज बृहन्मुंबई महानगरपालिका मुख्यालय में एक महत्वपूर्ण कार्यशाला आयोजित की गई। इस कार्यशाला में भूजल संसाधनों के संरक्षण, उपयोग और भविष्य की रणनीति को लेकर विस्तृत चर्चा हुई।
कार्यक्रम में केंद्र सरकार के जलशक्ति मंत्रालय के अधीन केंद्रीय भूजल मंडल के वरिष्ठ भूजल वैज्ञानिक उपेंद्र धोंडे ने भूजल की वर्तमान स्थिति, उसके भंडार और उपयोग के वैज्ञानिक तरीकों पर प्रस्तुति दी। उन्होंने बताया कि भूजल की जानकारी को आम लोगों तक पहुंचाना और उसका सही उपयोग सुनिश्चित करना समय की बड़ी जरूरत है।

इस कार्यशाला का आयोजन बृहन्मुंबई महानगरपालिका आयुक्त भूषण गगराणी, अतिरिक्त आयुक्त डॉ. अश्विनी जोशी और डॉ. अविनाश ढाकणे के मार्गदर्शन में किया गया। बैठक में पर्यावरण, जल संसाधन, नियोजन और जल अभियांत्रिकी विभाग सहित विभिन्न सरकारी और निजी संस्थाओं के कुल 56 प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिनमें 31 प्रत्यक्ष और 25 ऑनलाइन शामिल रहे।
कार्यशाला में राष्ट्रीय जलभंडार नक्शांकन और प्रबंधन कार्यक्रम (NAQUIM) के तहत मुंबई से जुड़े महत्वपूर्ण निष्कर्ष भी साझा किए गए। वैज्ञानिकों ने बताया कि शहर में भूजल का बढ़ता दोहन, प्रदूषण और समुद्री तट होने के कारण खारेपन का खतरा गंभीर चिंता का विषय है।
विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि भूजल के अंधाधुंध दोहन पर नियंत्रण, प्रदूषण में कमी और कृत्रिम पुनर्भरण जैसी तकनीकों को अपनाना बेहद जरूरी है। साथ ही अटल भूजल योजना, जलशक्ति अभियान और मिशन अमृत सरोवर जैसी योजनाओं की जानकारी भी साझा की गई।
बैठक में यह भी बताया गया कि भूजल से जुड़े डेटा का व्यापक प्रसार क्षेत्रीय स्तर पर बेहतर योजना और निर्णय लेने में मदद करेगा। इस मौके पर ‘कृत्रिम पुनर्भरण संरचनाओं की सफलता की कहानियां’ नामक पुस्तक का भी विमोचन किया गया।
कार्यशाला के दौरान भूजल नियमन, जल लेखा परीक्षण और तटीय क्षेत्रों में जल प्रदूषण जैसे अहम मुद्दों पर गहन चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने प्रभावी भूजल प्रबंधन के लिए नियमों को सरल बनाने और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
कुल मिलाकर, इस कार्यशाला ने मुंबई के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए जल प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल का संकेत दिया है।