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बोलबच्चनगिरी और मतपेटी में शून्य : राज ठाकरे की राजनीतिक दुविधा

by Real Khabren
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बोलबच्चनगिरी और मतपेटी में शून्य :

राजनीति में भाषणों से सुर्खियाँ बटोरी जा सकती हैं, सभाएँ सजाई जा सकती हैं और तालियाँ पाई जा सकती हैं; लेकिन मतदान के दिन मतपेटी तक वोट पहुँचवाना ही असली कसौटी होती है। इस कसौटी पर राज ठाकरे लगातार असफल रहे हैं, और इसकी जड़ में एक ही कारण है खुद कभी चुनाव न लड़ना।


जो नेता खुद चुनाव नहीं लड़ता, वह धीरे-धीरे मतदाताओं की मानसिकता से कटता चला जाता है। घर-घर जाकर वोट माँगने की मजबूरी न होना, अपमान, अस्वीकृति, सवाल और ताने न सहने पड़ना इन सबके अभाव में यह समझ ही नहीं बन पाती कि मतदाता क्या सोचता है, क्या चाहता है, किस बात पर नाराज़ होता है और किस पर शांत रहता है। राज ठाकरे के साथ भी यही हुआ है।


उनके भाषण सुनने पर साफ़ महसूस होता है कि वे मतदाता से संवाद नहीं करते, बल्कि दर्शकों पर टिप्पणी करते हैं। चुनावी मैदान में उतरा नेता जहाँ यह गणित रखता है कि “यह बोला तो वोट जाएगा”, वहीं राज ठाकरे पर ऐसी कोई राजनीतिक जवाबदेही नहीं होती। इसी वजह से उनकी वक्तृत्व कला धीरे-धीरे बोलबच्चनगिरी में बदल गई है।

आज मतदाता को सिर्फ़ आक्रामक शब्द नहीं चाहिए; उसे अपना प्रतिनिधि चाहिए जो संकट में साथ खड़ा हो, संसद या विधानसभा में उसके सवाल उठाए, और ज़रूरत पड़े तो सत्ता से सीधे टकराए। लेकिन जो नेता खुद मतपत्रिका पर ही नहीं होता, वह मतदाता के पक्ष में खड़े होने का नैतिक अधिकार भी धीरे-धीरे खो देता है।


इसी कारण राज ठाकरे के भाषण सोशल मीडिया पर वायरल होते हैं, चर्चा में रहते हैं; लेकिन वही चर्चा वोटों में तब्दील नहीं हो पाती। क्योंकि मतदाता के मन में एक सीधा सवाल होता है “यह नेता चुने जाने के बाद मेरे लिए ठोस तौर पर क्या करेगा?”
इस सवाल का स्पष्ट जवाब राज ठाकरे आज तक नहीं दे पाए हैं।


नेतृत्व सिर्फ़ आलोचना करना नहीं होता; नेतृत्व खुद आगे आकर जिम्मेदारी लेने का नाम है। खुद चुनाव न लड़कर दूसरों से लड़वाना, नतीजों के बाद विश्लेषण करना और हार का ठीकरा कार्यकर्ताओं पर फोड़ना—इससे कार्यकर्ता भी भ्रमित होता है और मतदाता भी दूर हो जाता है।

राज ठाकरे के पास आज भी बुद्धिमत्ता है, भाषा पर पकड़ है, मुद्दे रखने की ताकत है। लेकिन जब तक वे खुद चुनावी मैदान में नहीं उतरते, तब तक उनकी भूमिका “टिप्पणीकार” की ही मानी जाएगी, “लोकप्रतिनिधि” की नहीं।
और महाराष्ट्र का मतदाता अब इतना परिपक्व हो चुका है कि
वह तालियों पर नहीं, बल्कि मतपेटी पर भरोसा करता है।

दिनेश शिंदे ( शिवसेना शिंदे )

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