गुजरात की धरती से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर इतिहास के पन्ने पलटते हुए कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है।
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अवसर पर पीएम मोदी ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से जुड़ी उस ऐतिहासिक घटना का जिक्र किया, जब देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सोमनाथ मंदिर जाने का विरोध किया गया था।
पीएम मोदी ने बिना किसी का नाम लिए कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों ने उस दौर में भी कट्टरपंथी ताकतों के सामने घुटने टेक दिए थे। उन्होंने याद दिलाया कि जब सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया था, तब भी उन्हें रोकने की कोशिशें की गई थीं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि दुर्भाग्य से आज भी देश में वही सोच पूरी तरह सक्रिय है, जिसने कभी सोमनाथ के पुनर्निर्माण का विरोध किया था। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय तलवारें थीं और आज भारत को कमजोर करने के लिए दूसरे कुत्सित तरीके अपनाए जा रहे हैं। पीएम मोदी ने देशवासियों से एकजुट रहने और ऐसी हर ताकत को हराने का आह्वान किया, जो देश को बांटने की साजिश रच रही है।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने 1951 की घटना का विशेष तौर पर उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को आमंत्रित किया गया था, तब भी इसका विरोध हुआ था। उस समय सौराष्ट्र के प्रसिद्ध जामनगर के महाराज दिग्विजय सिंह आगे आए और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के समर्थन में मजबूती से खड़े हुए।
दरअसल, 11 मई 1951 को सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन हुआ था। उस समय देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे, जिन्होंने इस समारोह में शामिल होने से इनकार कर दिया था। इतना ही नहीं, नेहरू ने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सोमनाथ जाने के फैसले पर आपत्ति जताते हुए उन्हें पत्र भी लिखा था। इस फैसले के विरोध में उस दौर की कई राजनीतिक ताकतें खुलकर सामने आई थीं।

पीएम मोदी ने कहा कि जब हम अपनी आस्था, अपनी जड़ों और अपनी विरासत से जुड़े रहते हैं, तभी हमारी सभ्यता की नींव मजबूत होती है।
सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत के स्वाभिमान, आत्मविश्वास और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। प्रधानमंत्री के इस बयान को कांग्रेस और नेहरू युग की नीतियों पर सीधे-सीधे वैचारिक हमला माना जा रहा है, जिसने एक बार फिर सियासी बहस को तेज कर दिया है।