मुंबई में मराठी भाषा दिवस के अवसर पर शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भारतीय जनता पार्टी पर तीखा हमला बोला। अपने संबोधन में उन्होंने दिल्ली की राजनीति, क्षेत्रीय अस्मिता, मराठी भाषा, ठाकरे परिवार की एकजुटता, राष्ट्रगान और धार्मिक ग्रंथों जैसे कई मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी।
उद्धव ठाकरे ने अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के निर्दोष साबित होने का जिक्र करते हुए उनका अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि आजकल किसी पर भी आरोप लगाकर जेल भेज दिया जाता है, यहां तक कि एक राज्य के मुख्यमंत्री को पद पर रहते हुए जेल में डाल दिया जाता है और बाद में अदालत में सबूत के अभाव में बरी कर दिया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि झूठे आरोप लगाने वालों पर क्या कार्रवाई होगी और क्या इसे ही ‘रामराज्य’ कहा जाएगा?

ठाकरे भाइयों को साथ लाने के दावों पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा कि जो लोग पहले मतभेद पैदा करते हैं, वही आज एकजुटता का श्रेय लेने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर ठाकरे भाइयों को साथ लाया गया है तो क्या अब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को भी एक करने की कोशिश होगी, क्योंकि इन दिनों विलय की चर्चाएं चल रही हैं।
मराठी अस्मिता के मुद्दे पर उद्धव ठाकरे ने दोहराया कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने मराठी भाषा को लेकर सख्त रुख अपनाया था और आज भी उसी पर कायम हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में पूरा राज्य ममता बनर्जी के पीछे मजबूती से खड़ा रहता है, वहीं तमिलनाडु में भी क्षेत्रीय पहचान को लेकर एकजुटता दिखाई देती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषा पर गर्व करना देश से अलग होना नहीं, बल्कि अपनी पहचान के साथ राष्ट्र को सर्वोपरि रखना है।

प्रादेशिक अस्मिता के संदर्भ में उन्होंने आशंका जताई कि क्या भविष्य में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को भी बदला जाएगा, क्योंकि उसमें देश के विभिन्न प्रांतों का उल्लेख है।
धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि आज कई लोग भागवत गीता सिखाने की बात करते हैं, लेकिन संत ज्ञानेश्वर ने कम उम्र में ‘ज्ञानेश्वरी’ लिखकर उसके गहन अर्थ को समझाया। उन्होंने लोगों से अपील की कि एक-दूसरे को भगवद्गीता के साथ ज्ञानेश्वरी भी भेंट करें और कहा कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी आएं तो उन्हें भी ज्ञानेश्वरी दी जानी चाहिए।
रामराज्य की अवधारणा पर सवाल उठाते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा कि आदर्श शासन का उदाहरण इतिहास में Chhatrapati Shivaji Maharaj के कार्यों में मिलता है। उन्होंने आरोप लगाया कि विरोधियों को बदनाम करना, दबाव बनाना या झूठे मामलों में फंसाना किसी भी तरह से रामराज्य नहीं हो सकता।