डॉ. भीमराव अंबेडकर (14 अप्रैल 1891 – 6 दिसंबर 1956) भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार, समाज सुधारक और स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री थे। ‘बाबासाहेब’ के नाम से प्रसिद्ध, उन्होंने दलितों, महिलाओं और श्रमिकों के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया। उन्होंने भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डॉ. भीमराव अंबेडकर की जाति व्यवस्था पर सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली किताब “जाति का विनाश” (Annihilation of Caste) है। इसमें उन्होंने भारतीय समाज की जाति-प्रणाली पर बहुत तीखा और तर्कपूर्ण विश्लेषण किया है। इस किताब की 10 मुख्य बातें इस तरह समझी जा सकती हैं:

- जाति सिर्फ श्रम-विभाजन नहीं, श्रमिकों का विभाजन है
अंबेडकर कहते हैं कि जाति व्यवस्था इंसान को जन्म से ही एक पेशे में बाँध देती है, चाहे उसकी योग्यता कुछ भी हो। - जाति-प्रणाली सामाजिक असमानता की जड़ है
यह व्यवस्था ऊँच-नीच को स्थायी बनाती है और समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। - जाति का संबंध धर्म से जोड़ना सबसे खतरनाक है
अंबेडकर मानते हैं कि जब जाति को धार्मिक मान्यता मिल जाती है, तो उसे चुनौती देना मुश्किल हो जाता है। - हिंदू समाज में “भाईचारे” का अभाव
उनके अनुसार जाति व्यवस्था हिंदुओं को एक समाज नहीं, बल्कि अलग-अलग बंद समूहों में बाँटती है। - सुधार नहीं, विनाश जरूरी है
अंबेडकर स्पष्ट कहते हैं कि जाति को “सुधारने” से कुछ नहीं होगा, इसे पूरी तरह खत्म करना होगा। - शास्त्रों की आलोचना
वे मनुस्मृति जैसे ग्रंथों की खुलकर आलोचना करते हैं, जो जातिगत भेदभाव को正 ठहराते हैं। - समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का समर्थन
उनका तर्क है कि बिना जाति खत्म किए ये तीनों मूल्य समाज में संभव नहीं हैं। - राजनीतिक सुधार सामाजिक सुधार के बिना अधूरे हैं
सिर्फ कानून बदलने से कुछ नहीं होगा, जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी। - जाति लोकतंत्र के खिलाफ है
अंबेडकर कहते हैं कि जाति व्यवस्था लोकतंत्र को खोखला कर देती है, क्योंकि यह समान नागरिकता को नकारती है। - नैतिक साहस की अपील
वे समाज से आग्रह करते हैं कि लोग परंपरा और धर्म के नाम पर अन्याय को स्वीकार न करें, बल्कि सवाल उठाएँ।

अंबेडकर कहते हैं कि दुनिया में हर जगह असमानताएं रहीं लेकिन भारत की जाति व्यवस्था सबसे अलग और अकेली है. क्योंकि ये जन्म के साथ बहुत कुछ तय कर देती हैं. दुनिया में वर्ग व्यवस्था आर्थिक होती है. भारत में जाति व्यवस्था धार्मिक–नैतिक श्रेणीकरण है. कौन शुद्ध है, कौन अपवित्र – ये तय करता है. यह व्यवस्था सामूहिक विद्रोह को असंभव बनाती है.