मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य टकराव के बीच अमेरिका के भीतर भी विरोध की आवाजें तेज हो गई हैं। इजरायल और अमेरिका के हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद क्षेत्र में तनाव चरम पर है। इसी बीच न्यूयॉर्क की सड़कों पर सैकड़ों लोग ईरान पर हमले के खिलाफ प्रदर्शन करने उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने हाथों में तख्तियां और ईरान के झंडे लेकर नारे लगाए “जंग नहीं, लोगों को पैसे की जरूरत है।”
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि अमेरिकी संसाधनों को युद्ध में झोंकने के बजाय स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार पर खर्च किया जाना चाहिए। उनका आरोप है कि यह संघर्ष आम नागरिकों के हित में नहीं है।

उधर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ को अब तक का सबसे बड़ा और जटिल सैन्य अभियान बताते हुए कहा है कि यह कार्रवाई तब तक जारी रहेगी, जब तक सभी रणनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं हो जाते। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिकी सैनिकों की मौत का बदला लिया जाएगा।
इस बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका पर इजरायल के समर्थन में “चुनावी युद्ध” में शामिल होने का आरोप लगाया है। वहीं अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने संकेत दिए हैं कि जब तक ईरान को परमाणु हथियार क्षमता से वंचित नहीं कर दिया जाता, तब तक दबाव जारी रहेगा।

तनाव के बीच NATO के महासचिव मार्क रूटे ने स्पष्ट किया है कि नाटो इस संघर्ष में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं होगा। दूसरी ओर कतर के रक्षा मंत्रालय ने दावा किया है कि उसकी वायुसेना ने ईरान के दो लड़ाकू विमानों को मार गिराया और कई मिसाइलों व ड्रोनों को इंटरसेप्ट किया।
लगातार बढ़ते सैन्य हमलों और कड़े बयानों के बीच यह आशंका गहराती जा रही है कि यह संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है। दुनिया की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीतिक प्रयास इस आग को थाम पाएंगे, या हालात और भयावह दिशा में बढ़ेंगे।