बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। राज्य की मौजूदा शराबबंदी नीति पर सत्ता पक्ष के ही कुछ सहयोगी दल सवाल उठा रहे हैं। शराबबंदी के समर्थन और विरोध में अलग-अलग तर्क सामने आ रहे हैं।
बिहार सरकार का दावा है कि शराबबंदी लागू होने के बाद घरेलू हिंसा और पारिवारिक झगड़ों के मामलों में करीब 12 से 18 प्रतिशत तक कमी आई है। सरकार का मानना है कि शराब समाजिक समस्याओं की बड़ी वजह बन रही थी और इसी को ध्यान में रखकर यह फैसला लिया गया था।
हालांकि सहयोगी दलों में शामिल जीतन राम माझी और चिराग पासवान लगातार शराबबंदी की समीक्षा और सीमित शराब बिक्री की मांग कर रहे हैं। इन नेताओं का कहना है कि शराबबंदी के बावजूद राज्य में अवैध शराब का कारोबार जारी है, जिससे जहरीली शराब की घटनाएं भी सामने आ रही हैं।

वहीं दूसरी ओर कुछ राजनीतिक दलों का आरोप है कि शराबबंदी कानून के कारण राज्य पर आर्थिक बोझ बढ़ा है और प्रशासनिक संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा है। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि शराब तस्करों ने एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर ली है।
इसी बीच राष्ट्रीय लोक मोर्चा के कुछ प्रतिनिधियों ने जागरूकता अभियान को ज्यादा प्रभावी बताने की बात कही है। उनका कहना है कि केवल कानून बनाने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती, बल्कि समाज में जागरूकता भी जरूरी है।
अब सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहयोगी दलों के दबाव में शराबबंदी नीति पर कोई बदलाव करेंगे या फिर सरकार अपने पुराने रुख पर ही कायम रहेगी? बिहार की राजनीति में इस मुद्दे पर आगे क्या होगा, यह देखना दिलचस्प होगा।