महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया इतिहास तब बना, जब सुनेत्रा पवार ने राज्य की पहली महिला उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। सत्ता के इस शिखर तक पहुंचने के साथ ही उनके नाम से जुड़ा 25 हजार करोड़ रुपये का महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक घोटाला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। भले ही मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने उन्हें और अजित पवार को क्लीनचिट दे दी हो, लेकिन कानूनी तौर पर यह मामला अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।
एमएससीबी घोटाला राज्य के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में गिना जाता है। यह मामला बैंक के अंतर्गत आने वाले 31 जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों से जुड़ा है, जिनके प्रमुख पदों पर उस समय कई प्रभावशाली नेता थे। आरोप है कि इन बैंकों ने नियमों को ताक पर रखकर सहकारी चीनी मिलों को भारी-भरकम ऋण दिए। 2002 से 2017 के बीच इन मिलों ने बड़े पैमाने पर भुगतान में चूक की, जिससे बैंक को करीब 25 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

आरोपों के मुताबिक, नुकसान की भरपाई के नाम पर चीनी मिलों और उनसे जुड़ी जमीनों की नीलामी बेहद कम कीमतों पर की गई। इन नीलामियों में खरीदारों के तौर पर बैंक अधिकारियों और राजनेताओं के रिश्तेदार सामने आए। इसी मामले को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर हुई, जिसके निर्देश पर 2019 में एफआईआर दर्ज की गई और बाद में प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया।
ईडी की जांच में जारंदेश्वर शुगर कोऑपरेटिव मिल की नीलामी खास तौर पर फोकस में रही। एजेंसी के अनुसार, एमएससीबी ने यह मिल 2010 में 65.7 करोड़ रुपये में बेची थी और बाद में इसे बेहद कम किराए पर एक नई कंपनी को पट्टे पर दे दिया गया। इस पूरे लेन-देन में सुनेत्रा पवार का नाम उस कंपनी से जुड़ने के कारण सामने आया, जिसमें वे निदेशक थीं। ईडी का दावा रहा कि नीलामी के लिए इस्तेमाल की गई रकम का स्रोत संदिग्ध था।

वहीं, आयकर विभाग ने भी बेनामी संपत्ति कानून के तहत सुनेत्रा पवार और अजित पवार की जांच की थी और करीब 1,000 करोड़ रुपये की संपत्तियां जब्त की थीं। हालांकि, न्यायनिर्णय प्राधिकरण और बाद में अपीलीय न्यायाधिकरण से दंपति को राहत मिली। अदालतों का कहना था कि संपत्तियों के भुगतान से जुड़े ठोस सबूत नहीं हैं, इसलिए उन्हें वास्तविक मालिक नहीं माना जा सकता।
अब इस मामले में नया मोड़ तब आया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने बेनामी लेनदेन कानून से जुड़े अपने पुराने आदेश को वापस लिया। सामाजिक कार्यकर्ता अंजली दमानिया ने इसी आधार पर आयकर विभाग से पवार परिवार के खिलाफ जांच फिर से खोलने की मांग की है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि इनकम टैक्स विभाग दोबारा सक्रिय हो सकता है।
कुल मिलाकर, सुनेत्रा पवार भले ही संवैधानिक पद पर पहुंच गई हों, लेकिन एमएससीबी घोटाले से जुड़ी जांचें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। ईडी का मामला अदालत में लंबित है और आयकर जांच के फिर से खुलने की संभावना बनी हुई है। यही वजह है कि सत्ता की शपथ के साथ ही उनके नाम के साथ विवाद और जांच की चर्चा भी लगातार बनी हुई है।