
नई दिल्ली। देश के कई हिस्सों में मॉनसून की रफ्तार अपेक्षा से धीमी पड़ने लगी है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो प्रभाव और बदलते वैश्विक मौसम पैटर्न के कारण बारिश की गतिविधियों में कमी देखी जा रही है, जिससे कृषि क्षेत्र समेत कई आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त वर्षा नहीं होती है तो खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। विशेष रूप से धान, मक्का, सोयाबीन और दालों की खेती पर इसका सीधा असर पड़ने की संभावना है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा मॉनसून पर निर्भर होने के कारण किसानों की चिंता बढ़ गई है।
बारिश की कमी का असर निर्माण क्षेत्र पर भी पड़ सकता है। जलाशयों और बांधों में पानी का स्तर अपेक्षित गति से नहीं बढ़ने पर पेयजल और सिंचाई संबंधी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। इसके अलावा बिजली उत्पादन और औद्योगिक गतिविधियों पर भी दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि कमजोर मॉनसून खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर सकता है, जिससे महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि सरकार और मौसम विभाग स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और आगामी सप्ताहों में वर्षा की स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मॉनसून के अगले चरण का प्रदर्शन कृषि उत्पादन, ग्रामीण मांग और देश की आर्थिक वृद्धि दर के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा।