अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब खाड़ी देशों की सबसे अहम जरूरत पानी पर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अगर जंग लंबी खिंचती है तो ईरान सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और बहरीन जैसे देशों में समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने वाले डीसैलिनेशन प्लांट्स को निशाना बना सकता है। ये प्लांट पूरे खाड़ी क्षेत्र की लाइफलाइन माने जाते हैं।
दरअसल खाड़ी के ज्यादातर देशों में प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत बेहद सीमित हैं। ऐसे में इन देशों ने समुद्र के खारे पानी को पीने लायक बनाने के लिए बड़े-बड़े डीसैलिनेशन संयंत्र लगाए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार 1970 के दशक के बाद से पूरे खाड़ी क्षेत्र में ऐसे करीब 450 संयंत्र बनाए जा चुके हैं, जिनसे करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की पानी की जरूरत पूरी होती है।
अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA पहले ही यह चेतावनी दे चुकी है कि भविष्य में पानी एक महत्वपूर्ण भू-रणनीतिक संसाधन बन सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर खाड़ी क्षेत्र में सैन्य संघर्ष तेज होता है और इन पानी के संयंत्रों को नुकसान पहुंचता है, तो इसका असर पूरे क्षेत्र की आबादी और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

खतरा खासतौर पर सऊदी अरब के जुबैल इलाके में मौजूद विशाल डीसैलिनेशन प्लांट और उससे जुड़ी लगभग 500 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन पर बताया जा रहा है। यही पाइपलाइन राजधानी रियाद को करीब 90 प्रतिशत पेयजल सप्लाई करती है। अमेरिकी राजनयिक दस्तावेजों में पहले भी आशंका जताई गई थी कि अगर इस पाइपलाइन को नुकसान पहुंचा तो रियाद जैसे बड़े शहर को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर खाड़ी में पानी की सप्लाई ठप हो जाती है तो हालात बेहद गंभीर हो सकते हैं। तेल और गैस से समृद्ध इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था भले मजबूत हो, लेकिन पानी की कमी यहां की सबसे बड़ी चुनौती है।

इसी बीच मुंबई और दुबई के बीच प्रस्तावित अंडरवॉटर हाई-स्पीड रेल लिंक की चर्चा भी फिर से होने लगी है। इस परियोजना के तहत समुद्र के नीचे एक हाई-स्पीड रेल टनल बनाने का प्रस्ताव दिया गया था, जिसके जरिए मुंबई से दुबई तक करीब दो घंटे में यात्रा संभव बताई गई थी।
रिपोर्ट्स के अनुसार इस नेटवर्क का इस्तेमाल यात्रियों के साथ-साथ तेल और पानी की सप्लाई के लिए भी किया जा सकता है। अगर भविष्य में यह परियोजना साकार होती है तो भारत और खाड़ी देशों के बीच ऊर्जा और जल आपूर्ति का एक नया विकल्प सामने आ सकता है।
हालांकि फिलहाल यह परियोजना प्रस्ताव के स्तर पर ही है, लेकिन खाड़ी में बढ़ते तनाव और संभावित जल संकट के बीच इस तरह के विकल्पों पर चर्चा तेज होती नजर आ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जंग में पानी के ढांचे को निशाना बनाया गया तो इसका असर सिर्फ खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर भी पड़ेगा।