Home वेब स्टोरीजमंबाजी की पार्टी या तुकोबा की परंपरा? वारकरी संप्रदाय पर ‘घुसपैठ’ का आरोप, NCP (शरद पवार) के प्रवक्ता का बड़ा बयान”

मंबाजी की पार्टी या तुकोबा की परंपरा? वारकरी संप्रदाय पर ‘घुसपैठ’ का आरोप, NCP (शरद पवार) के प्रवक्ता का बड़ा बयान”

by Real Khabren
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मंबाजी की पार्टी या तुकोबा की

मुंबई से एक बड़ा राजनीतिक और धार्मिक बयान सामने आया है, जहां राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शरदचंद्र पवार गुट के प्रवक्ता विकास लवांडे ने वारकरी संप्रदाय को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं।
प्रेस से बातचीत में विकास लवांडे ने सवाल उठाते हुए कहा “यह मंबाजी की पार्टी है या तुकोबा की परंपरा? इसका जवाब घुसपैठ करने वालों को देना होगा।”


लवांडे ने वारकरी संप्रदाय की परंपराओं को गिनाते हुए कहा कि इस संप्रदाय की पहचान गोपीचंदन का तिलक, गले में तुलसी की माला, एकादशी का व्रत, आळंदी से पंढरपुर की वारी, भजन-कीर्तन और ‘राम कृष्ण हरी’ मंत्र से होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वारकरी परंपरा में भगवा ध्वज नहीं, बल्कि काऊ रंग का ध्वज होता है और अनुयायी सफेद वस्त्र धारण करते हैं।


उन्होंने कहा कि वारकरी संप्रदाय का आराध्य देव पंढरपुर के श्री विठ्ठल-रखुमाई हैं और इसके प्रमुख ग्रंथ ज्ञानेश्वरी, अमृतानुभव, एकनाथी भागवत और संत तुकाराम महाराज की गाथा हैं। इस परंपरा में कर्मकांड, यज्ञ, होम-हवन या अंधविश्वास के लिए कोई जगह नहीं है।


विकास लवांडे ने आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों में बाहरी और मनुवादी विचारधारा से जुड़े लोग महाराष्ट्र में आकर वारकरी संप्रदाय की मूल विचारधारा को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि ऐसे कार्यक्रमों को भाजपा और आरएसएस का समर्थन मिलता है।
उन्होंने कुछ धार्मिक गुरुओं और कथावाचकों के नाम लेते हुए कहा कि ये लोग मनुस्मृति आधारित विचारधारा फैलाकर समाज में जाति और धर्म के आधार पर विभाजन कर रहे हैं और अंधश्रद्धा को बढ़ावा दे रहे हैं।


लवांडे ने यह भी कहा कि जिस तरह कुछ कट्टर मौलवी मुस्लिम समाज में लोगों की आस्था का दुरुपयोग करते हैं, उसी तरह कुछ तथाकथित संत भी हिंदू समाज में भ्रम फैला रहे हैं। उन्होंने इसे भारतीय संविधान की भावना के खिलाफ बताया।


उन्होंने कहा कि वारकरी संप्रदाय मूल रूप से समता, बंधुत्व और मानवता पर आधारित है, जहां किसी भी प्रकार का जाति, धर्म या लिंग भेद नहीं है।
अपने बयान में लवांडे ने संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम को नमन करते हुए कहा कि इन संतों ने समाज सुधार और समानता का संदेश दिया, लेकिन आज उसी विचारधारा को कमजोर करने की कोशिश हो रही है।


प्रवक्ता ने यह भी दावा किया कि वारकरी परंपरा में कुछ “घुसपैठिए” सक्रिय हैं, जो संतों के मंच से विपरीत विचार पेश कर रहे हैं। उन्होंने ऐसे 20 नामों की सूची भी जारी की है और इसे वैचारिक संघर्ष बताया है, न कि व्यक्तिगत विवाद।


फिलहाल, इस बयान के बाद राजनीतिक और धार्मिक हलकों में बहस तेज होने की संभावना है।

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