Home वेब स्टोरीजअजित पवार के बाद कौन? महाराष्ट्र की राजनीति में नेतृत्व का संकट, नए समीकरणों की तलाश

अजित पवार के बाद कौन? महाराष्ट्र की राजनीति में नेतृत्व का संकट, नए समीकरणों की तलाश

by Real Khabren
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महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार का अचानक जाना केवल एक नेता का जाना नहीं है, बल्कि यह उस सियासी धुरी का टूटना है, जिसके इर्द-गिर्द बीते दो दशकों से सत्ता के समीकरण घूमते रहे। बारामती से लेकर मंत्रालय तक, और सहकारिता से लेकर मराठा राजनीति तक अजित पवार का असर हर मोर्चे पर दिखाई देता था। अब उनके न रहने से राज्य की राजनीति में एक ऐसा शून्य पैदा हो गया है, जिसकी भरपाई फिलहाल आसान नहीं दिखती।

राज्य में फिलहाल ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार कायम है। बीजेपी, शिंदे गुट और अजित पवार गुट के विधायकों की संख्या बहुमत से कहीं ज्यादा है, इसलिए सरकार की स्थिरता पर तात्कालिक खतरा नहीं है। लेकिन अजित पवार के 41 विधायकों वाला गुट सबसे बड़े नेतृत्व संकट से जूझ रहा है। उपमुख्यमंत्री पद खाली हो चुका है और अजित गुट की एनसीपी के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब कमान किसके हाथ में होगी।
राजनीतिक गलियारों में कई नामों की चर्चा है। छगन भुजबल जैसे वरिष्ठ नेता खुलकर दावेदारी कर सकते हैं, लेकिन गुट के भीतर अभी तक कोई ऐसा चेहरा नहीं उभरा है, जिसे सर्वमान्य नेता माना जा सके। यही वजह है कि आने वाले दिनों में अजित गुट के भीतर अंदरूनी खींचतान तेज होने की आशंका है। यह संघर्ष गुट को एकजुट रखेगा या और कमजोर करेगा—यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।

एक और अहम सवाल दोनों एनसीपी गुटों के भविष्य को लेकर है। क्या शरद पवार और अजित पवार गुट फिर से एक हो सकते हैं? हाल के चुनावी अनुभव बताते हैं कि राजनीति में असंभव कुछ भी नहीं है, लेकिन नेतृत्व का प्रश्न यहां सबसे बड़ी बाधा है। अगर दोनों गुट एक होते हैं, तो नेतृत्व को लेकर तीन नाम सामने आते हैं शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले, अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार और उनके पुत्र पार्थ पवार।
सुप्रिया सुले फिलहाल शरद पवार गुट का चेहरा हैं और सांसद भी हैं। सुनेत्रा पवार राज्यसभा सांसद हैं और अजित पवार की राजनीतिक विरासत की स्वाभाविक दावेदार मानी जा रही हैं। वहीं, पार्थ पवार युवा जरूर हैं, लेकिन चुनावी हार के बाद उनका राजनीतिक आधार अभी मजबूत नहीं माना जाता। इन परिस्थितियों में दोनों गुटों का तात्कालिक विलय मुश्किल दिखता है। ऐसे में यह संभावना मजबूत है कि अजित गुट का अस्तित्व बना रहे और नेतृत्व विवाद को टालने के लिए सुनेत्रा पवार को आगे किया जाए।

मराठा राजनीति पर भी अजित पवार के जाने का गहरा असर पड़ेगा। मराठा नेतृत्व पहले से ही कई धड़ों में बंटा हुआ है। अजित पवार एक ऐसे नेता थे, जो मराठा राजनीति और सत्ता के बीच संतुलन बनाए रखते थे। उनके जाने के बाद मराठा आरक्षण आंदोलन के फिर से तेज होने की संभावना है। इससे मराठा और ओबीसी राजनीति के बीच टकराव बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर राज्य की सियासत पर पड़ेगा।
सहकारिता और चीनी मिलों का क्षेत्र भी बड़े बदलाव के संकेत दे रहा है। पश्चिम महाराष्ट्र में यही क्षेत्र राजनीतिक ताकत का केंद्र रहा है। अजित पवार ने यहां शरद पवार को सीधी चुनौती दी थी। अब अजित के न रहने से शरद पवार के लिए दोबारा प्रभाव बढ़ाने का अवसर जरूर है, लेकिन उम्र और सीमित सक्रियता उनकी राह में चुनौती बन सकती है। ऐसे में बीजेपी इस खाली जगह को भरने की कोशिश कर सकती है, जिससे पश्चिम महाराष्ट्र की राजनीति का संतुलन बदल सकता है।

कुल मिलाकर, अजित पवार के बाद महाराष्ट्र की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। सत्ता फिलहाल स्थिर है, लेकिन नेतृत्व, जातीय समीकरण, आरक्षण आंदोलन और सहकारिता जैसे मुद्दों पर नए संघर्ष तय हैं। राजनीति में किसी के जाने से जो रिक्तता पैदा होती है, वही आने वाले समय के सबसे बड़े टकराव की जमीन भी बनती है। महाराष्ट्र की सियासत अब इसी नई पटकथा की ओर बढ़ रही है।

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