जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) एक बार फिर देश की सियासत के केंद्र में आ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ लगाए गए विवादित नारों ने न सिर्फ कैंपस बल्कि पूरे देश में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है।
JNU परिसर में पीएम और गृह मंत्री के खिलाफ कथित आपत्तिजनक नारों के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन हरकत में आया। प्रशासन ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला बताया और मामले में FIR दर्ज कराई गई। इसके बाद से यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है।

इस पूरे मामले पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का बयान अब सियासी विवाद का नया केंद्र बन गया है। नागपुर से उन्होंने बेहद तीखे शब्दों में कहा कि “JNU में शरजील इमाम की औलादों के इरादों को कुचल दिया जाएगा।” उन्होंने आगे कहा कि देश को तोड़ने वाली भाषा बोलने वालों के लिए भारत में कोई जगह नहीं है।
फडणवीस का यह बयान ऐसे समय आया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में शरजील इमाम और उमर खालिद को जमानत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट के फैसले के बाद JNU में हुए प्रदर्शनों ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया।
JNU में हुए विरोध प्रदर्शनों और नारों को लेकर अब देशभर में यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह अभिव्यक्ति की आज़ादी के दायरे में आता है या फिर इसे राष्ट्रविरोधी गतिविधि माना जाना चाहिए। सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर तीखी बयानबाज़ी जारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि फडणवीस के इस बयान से सियासी टकराव और तेज़ हो सकता है। आने वाले दिनों में JNU से जुड़ा यह मामला संसद से लेकर सड़कों तक और गूंज सकता है। फिलहाल, देश की निगाहें JNU और उससे जुड़ी राजनीति पर टिकी हुई हैं।
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