मुंबई से एक बड़ी राजनीतिक और सामाजिक खबर सामने आ रही है, जहां रिक्षा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा अनिवार्य करने के फैसले पर अब सियासत गरमा गई है। शिवसेना ने इस मुद्दे पर स्पष्ट और भावनात्मक रुख अपनाते हुए सरकार से बड़ा फैसला लेने की मांग की है।
शिवसेना के मुख्य प्रवक्ता संजय निरुपम ने कहा है कि मराठी भाषा महाराष्ट्र की पहचान, संस्कृति और गर्व का प्रतीक है, लेकिन इसे जबरदस्ती लागू करना सही नहीं है। उनका साफ कहना है कि भाषा को प्यार और समझदारी से सिखाया जाना चाहिए, न कि दबाव और डर के जरिए।
शिवसेना ने इस मुद्दे पर किसी भी तरह के आंतरिक मतभेद से इनकार किया है और कहा है कि पार्टी हमेशा मराठी भाषा के सम्मान के लिए आगे रही है। लेकिन साथ ही, आम मेहनतकश लोगों के हितों की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है।

दरअसल, सरकार के इस फैसले के बाद मुंबई में काम कर रहे हजारों गैर-मराठी रिक्षा और टैक्सी चालकों में असमंजस और डर का माहौल है। बड़ी संख्या में ऐसे चालक हैं जो मराठी सीखना चाहते हैं, लेकिन उन्हें इसके लिए पर्याप्त समय और अवसर चाहिए।
इसी को देखते हुए शिवसेना ने मांग की है कि इस फैसले को कम से कम एक साल के लिए टाल दिया जाए। इस दौरान सरकार को चाहिए कि वह चालकों के लिए मराठी सीखने के प्रशिक्षण और प्रोत्साहन की व्यवस्था करे।
शिवसेना का कहना है कि यह मुद्दा संवेदनशील है और इसे सख्ती से नहीं बल्कि समझदारी और इंसानियत के साथ संभालना चाहिए। पार्टी ने भावुक अंदाज में कहा प्यार से सीखी गई भाषा जिंदगी भर साथ रहती है, लेकिन डर से सीखी गई भाषा दिल में कभी जगह नहीं बना पाती।
अब देखना होगा कि सरकार इस मांग पर क्या रुख अपनाती है और क्या हजारों चालकों को राहत मिल पाती है या नहीं।